93 साल पहले त्रिवेणी संघ से शुरू हुई थी लव-कुश एकता की कहानी - 1933 से 2026 तक कुर्मी-कोइरी जुड़ाव टूटा-जुड़ा, नीतीश-शकुनी से नीतीश-सम्राट और अब सम्राट-निशांत तक नया अध्याय
आज से 93 साल पहले बिहार में पहली बार लव-कुश कुर्मी-कोइरी आधिकारिक रूप से एक मंच पर आए थे, कई कालखंडों में एकता टूटी-जुड़ी, 20 सितंबर 2026 को लव-कुश सम्मान समारोह से पुरानी कोशिश को नया रंग दिया गया। आज जातीय एकता नीति निर्धारक तत्व है जो जाति जितनी एकजुट उतनी राजनीतिक ताकत, इसी के लिए लव-कुश माइथोलॉजिकल मेटाफोर का प्रयोग हुआ भगवान राम-सीता के पुत्र लव-कुश के नाम पर लव मतलब कुर्मी कुश मतलब कुशवाहा कोइरी। पौराणिक में लव-कुश भाई वैसे ही राजनीति में कुर्मी-कुशवाहा भाई-भाई। बिहार में मिथक को पहली बार 1995 विधानसभा में नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी के साथ आने पर मूर्त रूप दिया गया, शकुनी 1985 में तारापुर से निर्दलीय जीते 1990 में कांग्रेस से फिर विधायक बने कुशवाहा बड़े नेता बने। अक्टूबर 1994 में समता पार्टी गठन पर पहली बार कुर्मी-कोइरी एकता के लिए लव-कुश उपमा का प्रयोग हुआ भावनात्मक उत्प्रेरक, शकुनी कांग्रेस छोड़ समता में आए 1995 में समता के 7 विधायक जीते जिनमें नीतीश और शकुनी भी, इसे लव-कुश का पहला प्रयोग माना गया। लेकिन पहली कोशिश अंग्रेज राज में 30 मई 1933 को शाहाबाद के करगहर में त्रिवेणी सं
बिहार में लव-कुश एकता की कहानी आज की नहीं, 93 साल पुरानी है। 1933 में पहली बार कुर्मी-कोइरी एक मंच पर आए थे। तब से कई बार यह एकता टूटी और जुड़ी। 20 सितंबर 2026 को हुए लव-कुश सम्मान समारोह ने इसी पुरानी कोशिश को नया रंग दिया है।
आज की राजनीति में जातीय एकता ही ताकत तय करती है। जो जाति जितनी एकजुट, उसकी सियासी ताकत उतनी ज्यादा। इसी एकता को जोड़ने के लिए लव-कुश जैसे पौराणिक रूपक का इस्तेमाल हुआ। भगवान राम और सीता के पुत्र लव-कुश के नाम पर - लव यानी कुर्मी और कुश यानी कुशवाहा / कोइरी। जैसे पुराणों में लव-कुश भाई हैं, वैसे ही बिहार की राजनीति में कुर्मी-कुशवाहा भाई हैं।
नीतीश और शकुनी से शुरू हुआ आधुनिक प्रयोग
इस मिथक को बिहार की राजनीति में पहली बार 1995 विधानसभा चुनाव में मूर्त रूप मिला जब नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी साथ आए। शकुनी चौधरी 1985 में तारापुर से निर्दलीय जीते थे, 1990 में कांग्रेस के टिकट पर फिर विधायक बने और कुशवाहा समाज के बड़े नेता बन गए।
अक्टूबर 1994 में समता पार्टी के गठन के वक्त पहली बार कुर्मी-कोइरी एकता के लिए लव-कुश शब्द का प्रयोग हुआ। यह एक भावनात्मक उत्प्रेरक था। 1995 में शकुनी कांग्रेस छोड़कर समता में आए, उस चुनाव में समता के सिर्फ 7 विधायक जीते, जिनमें नीतीश कुमार और शकुनी चौधरी भी थे। इसी को लव-कुश एकता का पहला राजनीतिक प्रयोग माना जाता है।
1933 में बना था त्रिवेणी संघ
लेकिन असली पहली कोशिश अंग्रेजों के समय हुई थी। 30 मई 1933 को शाहाबाद जिले के करगहर गांव में त्रिवेणी संघ बना। इसके सूत्रधार थे यदुनंदन मेहता (कोइरी), शिवपूजन सिंह (कुर्मी) और जगदेव सिंह यादव। त्रिवेणी यानी कोइरी-कुर्मी-यादव तीनों का संगम। 1939 के जिला बोर्ड चुनाव में इसे कुछ सीटों पर जीत भी मिली, लेकिन बाद में श्रेष्ठता की भावना से दरार पड़ गई, यादवों का कुर्मी-कोइरी से तालमेल बिगड़ा, कई नेता कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में चले गए और 1942 के बाद संगठन हाशिये पर चला गया।
कर्पूरी से लालू तक और फिर लव-कुश का उभार
बाद में प्रजा सोशलिस्ट और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के दौर में पिछड़ी जातियों के हक की बात उठी, कुर्मी-कोइरी एकता उसी में समाहित हो गई। 1978 में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़े और अति पिछड़े के लिए अलग-अलग आरक्षण कोटा बनाया तो राजनीति बदल गई। 1993 में लालू यादव ने अति पिछड़ों के अलग आरक्षण को खत्म करने की कोशिश की तो नीतीश ने विरोध किया, यहीं से यादव बनाम गैर-यादव की लाइन खिंची।
1994 में लालू को चुनौती देने के लिए ही नीतीश ने लव-कुश एकता पर जोर दिया और फिर अति पिछड़ों व सवर्णों को जोड़कर 2005 में लालू को सत्ता से हटाया। 2004 में लव-कुश शब्द फिर चर्चा में आया जब नीतीश ने कई सीनियर नेताओं को दरकिनार कर पहली बार 2000 में विधायक बने उपेंद्र कुशवाहा को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बना दिया।
नीतीश-सम्राट के बाद सम्राट-निशांत मॉडल
इस एकता का सबसे बड़ा प्रतीक 15 अप्रैल 2026 को दिखा जब भाजपा के सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने। संदेश गया कि एक लव (नीतीश कुमार) ने अपना पद एक कुश (सम्राट चौधरी) को सौंपकर एकता की बड़ी मिसाल दी। कहा जाता है कि नीतीश की इच्छा से ही भाजपा ने यह फैसला लिया। अब नीतीश राज्यसभा में हैं और सम्राट चौधरी व नीतीश के पुत्र निशांत मिलकर लव-कुश एकता का नया अध्याय लिख रहे हैं।
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