NDA में रहते हुए भी अलग राह, चिराग पासवान vs मांझी vs कुशवाहा, 3 की 3 रणनीति, एक ही लक्ष्य - वोट बैंक और सीट
बिहार में NDA एक है लेकिन अंदर 3 अलग-अलग सियासत चल रही है। चिराग पासवान युवा और दलित चेहरा बनकर खुद को बिहार का भविष्य दिखा रहे हैं, जीतन राम मांझी महादलित कार्ड और बीजेपी-वफादारी से सीटें बढ़ाने की जुगाड़ में हैं, वहीं उपेंद्र कुशवाहा परिवार-राजनीति और कुशवाहा वोट बैंक बचाने में लगे हैं। दिल्ली में CJP के प्रदर्शन पर मांझी ने युवाओं को 'तिलचट्टा-झींगुर' कहा तो चिराग ने पलटवार कर दिया। आरक्षण और सीट बंटवारे पर तीनों की अलग लाइन, लेकिन मकसद एक- NDA में रहकर अपनी जमीन मजबूत करो।
बिहार में NDA सरकार है, लेकिन गठबंधन के भीतर ही 3 अलग-अलग पार्टियां, 3 अलग-अलग पिच पर खेल रही हैं। नाम हैं - चिराग पासवान, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा।
तीनों NDA में हैं, मंत्री-पद लिए हुए हैं, लेकिन तीनों की स्ट्रैटेजी है - गठबंधन में रहो, अपनी दुकान अलग चमकाओ।
1. चिराग पासवान - युवा + सीएम फेस की रेस
चिराग की रणनीति सबसे क्लियर है। केंद्र में मंत्री रहते हुए भी वो अपनी स्वतंत्र लाइन रखते हैं। दिल्ली में छात्र आंदोलन पर जब मांझी ने प्रदर्शनकारियों को 'तिलचट्टा-झींगुर' और केंद्र सरकार को 'शेर' कहा, तो चिराग ने उसी दिन पलटवार कर दिया - "युवाओं को कमजोर या अराजक कहना गलत है, शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है।"
यही चिराग मॉडल है। वो खुद को NDA का सबसे लोकप्रिय युवा चेहरा दिखाना चाहते हैं। लोजपा(रामविलास) के नेता तो खुलेआम उन्हें 'भावी सीएम' तक बोल देते हैं। मुद्दा आरक्षण हो या बिहार के युवाओं का, चिराग हर जगह अपनी लाइन NDA से थोड़ी अलग रखकर दलित + युवा वोट बैंक पक्का कर रहे हैं।
2. जीतन राम मांझी - वफादारी दिखाओ, सीटें बढ़ाओ
मांझी की सियासत ठीक उल्टी है। वो बीजेपी के सबसे कट्टर समर्थक बनकर चलते हैं। CJP आंदोलन और CEC के इस्तीफे की मांग पर उन्होंने खुलकर केंद्र का साथ दिया।
लेकिन पर्दे के पीछे उनका टारगेट सीट शेयरिंग है। पिछले दिनों उन्होंने कहा था - "हमें तो झुनझुना मिला, सरकार के खिलाफ बोलने वालों को ज्यादा तवज्जो मिल रही है।" इशारा साफ था - चिराग की तरफ।
मांझी का फॉर्मूला है - महादलित कार्ड + मोदी-शाह के प्रति 100% वफादारी = ज्यादा सीटें।
3. उपेंद्र कुशवाहा - परिवार पहले, पार्टी बाद में
RLM प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा सबसे साइलेंट प्लेयर हैं। उन्होंने NDA में रहते हुए अपना काम निकाल लिया - पहले पत्नी को विधायक बनाया, फिर बेटे को मंत्री। अब वो कुशवाहा वोट बैंक को बचाए रखने के लिए अपने हिसाब से मुद्दे उठाते हैं।
दिलचस्प ये है कि उनकी पार्टी के 3 विधायक - माधव आनंद, रामेश्वर महतो और आलोक सिंह कई बार उनकी लाइन से अलग चले जाते हैं, जैसे अभी MLC चुनाव में सारण में निर्दलीय खड़ा कर दिया। इससे पता चलता है कि कुशवाहा को अपनी पार्टी के भीतर भी जमीन बचानी पड़ रही है।
नतीजा क्या?
तीनों नेता जानते हैं कि बिहार में अकेले लड़कर कोई नहीं जीत सकता, इसलिए NDA में हैं। लेकिन 2025-26 के विधानसभा और MLC चुनावों से पहले हर कोई अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ाना चाहता है।
चिराग को ज्यादा सीटें चाहिए ताकि वो CM की दावेदारी कर सकें, मांझी को अपनी पार्टी जिंदा रखने के लिए 8-10 सीटें चाहिए, और कुशवाहा को अपना कोर वोट इंटैक्ट रखना है।
यही कारण है कि एक ही गठबंधन में 3 अलग-अलग बयान, 3 अलग-अलग रणनीति रोज दिख रही है।
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