नेहरू से मोदी तक: 80 साल में कैसे बदली भारत की विदेश नीति, कांग्रेस-BJP में छिड़ी बहस

राहुल गांधी के बयान के बाद भारत की विदेश नीति पर बहस। 1947 से 2026 तक नेहरू के गुट निरपेक्षता से लेकर मोदी के 'एक्ट ईस्ट' तक सफर। इंदिरा, राव, वाजपेयी, मनमोहन और मोदी के दौर में दोस्त, दुश्मन और प्राथमिकताएं कैसे बदलीं, पढ़ें पूरा विश्लेषण।

Aug 15, 2026 - 18:12
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नेहरू से मोदी तक: 80 साल में कैसे बदली भारत की विदेश नीति, कांग्रेस-BJP में छिड़ी बहस

नई दिल्ली: कांग्रेस के रचनात्मक अधिवेशन में राहुल गांधी की PM मोदी की विदेश नीति पर टिप्पणी के बाद सियासी बवाल मच गया। BJP ने पलटवार किया तो विदेश मंत्रालय भी मैदान में उतरा। बहस के बीच सवाल ये है: आजादी के बाद से अब तक भारत की विदेश नीति बदली कैसे?

1947-1964: नेहरू का दौर - गुट निरपेक्षता और पंचशील  
आजादी के बाद दुनिया US और USSR में बंटी थी। पंडित नेहरू ने किसी गुट में न जाने का फैसला किया। इसी से गुट निरपेक्ष आंदोलन बना। पंचशील के जरिए शांति का संदेश दिया।  
दोस्त: सोवियत संघ, युगोस्लाविया  
चुनौती: चीन पर भरोसे की कीमत 1962 के युद्ध से चुकानी पड़ी। 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' नारा फेल हुआ।

1966-1984: इंदिरा का दौर - सख्त और राष्ट्रीय सुरक्षा केंद्रित  
इंदिरा गांधी ने दबावों को किनारे कर कड़े फैसले लिए। 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ जीत और 1974 में पहला परमाणु परीक्षण।  
दोस्त: 1971 में USSR से 20 साल की मैत्री संधि  
चुनौती: US ने 7वां बेड़ा भेजा, चीन-पाक को समर्थन मिला। US से रिश्ते तल्ख हुए।

1991-2014: राव से मनमोहन तक - आर्थिक कूटनीति का युग  
PV नरसिम्हा राव ने 'लुक ईस्ट' नीति शुरू की। अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 में परमाणु परीक्षण किया। मनमोहन सिंह के समय 2008 में US से नागरिक परमाणु डील हुई।  
दोस्त: US, इजरायल से रिश्ते खुले  
चुनौती: 1999 कारगिल, 2008 मुंबई हमले। पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश।

2014-2026: मोदी का दौर - 'एक्ट ईस्ट' और मुखर भारत  
PM मोदी ने 'एक्ट ईस्ट' को आगे बढ़ाया। भारत अब रूस और अमेरिका दोनों का साथी है और खुद को ग्लोबल साउथ की आवाज कहता है।  
दोस्त: US, रूस, फ्रांस, खाड़ी देश, इजरायल  
चुनौती: चीन सबसे बड़ी राजनीतिक-आर्थिक चुनौती। पाकिस्तान से आतंकवाद को लेकर रिश्ते तनावपूर्ण।

 80 साल में भारत की कूटनीति 'शांति और गुट निरपेक्षता' से निकलकर 'हितों और प्रभाव' वाली नीति बन गई है। नेहरू के दौर में जो दोस्त थे, आज प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। इसी बदलाव पर अब सियासत भी गर्म है।

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Kajal Tiwari

लेखक के बारे में, काजल तिवारी एक समर्पित पत्रकार और मीडिया प्रोफेशनल है, जिन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्ष 2019 से अपने करियर की शुरुआत की। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में स्नातक एवं स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है। पिछले लगभग 6–7 वर्षों के अपने पत्रकारिता अनुभव में मुझे पटना के कई प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला है। इस दौरान मैंने पत्रकारिता के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम किया, जिसमें न्यूज़ रिपोर्टिंग, ग्राउंड रिपोर्टिंग, राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों की कवरेज, इंटरव्यू, कंटेंट राइटिंग और वॉयसओवर शामिल हैं। पत्रकारिता मेरे लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को लोगों तक जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ पहुँचाने का माध्यम है। मेरा प्रयास हमेशा तथ्यों पर आधारित, स्पष्ट और प्रभावी पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों और दर्शकों तक सही जानकारी पहुँचाना रहा है।

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