बिहार में फिर गरमाया 'भूमिहार-ब्राह्मण' मुद्दा, सदन में उठी नाम बदलने की मांग
बिहार विधानसभा के मौजूदा सत्र में एक बार फिर 'भूमिहार' बनाम 'भूमिहार-ब्राह्मण' नाम को लेकर विवाद शुरू हो गया है। पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा ने कहा कि 2023 के जाति सर्वे में 'भूमिहार-ब्राह्मण' की जगह सिर्फ 'भूमिहार' लिखे जाने से भ्रम पैदा हुआ है। समुदाय का कहना है कि 1911 की जनगणना और 1931 के रिकॉर्ड में उनकी पहचान 'भूमिहार-ब्राह्मण' थी। विजय सिन्हा ने राजस्व रिकॉर्ड में 'भूमिहार-ब्राह्मण' जोड़ने का निर्देश दिया था। अब विधायकों ने 2027 की राष्ट्रीय जनगणना से पहले आधिकारिक नाम बदलने की मांग की है। नाराजगी में एक विधायक ने ST में शामिल करने की मांग भी कर दी।
पटना: बिहार विधानसभा के मानसून सत्र में एक पुराना सामाजिक मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। 'भूमिहार' बनाम 'भूमिहार-ब्राह्मण' कहे जाने को लेकर समुदाय और सरकार के बीच नाराजगी बढ़ गई है।
2023 के जाति सर्वे से शुरू हुआ विवाद
मुद्दे को पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा ने 24 जुलाई को सदन में उठाया। उन्होंने कहा कि राजस्व अभिलेखों, जिला गजेटियर और पुराने दस्तावेजों में समुदाय का नाम 'भूमिहार-ब्राह्मण' दर्ज है। लेकिन 2023 में हुए बिहार जाति सर्वेक्षण और जाति प्रमाण पत्रों में सिर्फ 'भूमिहार' लिखा गया है। इससे समाज में भ्रम की स्थिति बन गई है।
समुदाय के संगठनों का आरोप है कि सर्वे के दौरान एक ही समाज को भूमिहार, भूमिहार-ब्राह्मण, भुइनहार और भुइयार - 4 अलग-अलग वर्गों में बांट दिया गया। उनका कहना है कि इससे उनकी संख्या और पहचान दोनों प्रभावित हुई हैं।
इतिहास में क्या है नाम का जिक्र
भूमिहार समुदाय की मांग 20वीं सदी की शुरुआत से चली आ रही है। 1911 की ब्रिटिश जनगणना में पहली बार 'भूमिहार-ब्राह्मण' नाम दर्ज किया गया था। 1916 में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 'भूमिहार ब्राह्मण परिचय' पुस्तक लिखकर इसे अयाचक ब्राह्मणों का वंश बताया था। 1931 की जनगणना और पुराने खतियानों में भी यही नाम मिलता है।
सरकार का रुख और नेताओं की मांग
2025 में राजस्व मंत्री बनने के बाद विजय कुमार सिन्हा ने निर्देश दिया था कि खतियान और राजस्व पोर्टल पर 'भूमिहार-ब्राह्मण' विकल्प जोड़ा जाए। अब विधायक चाहते हैं कि 2027 की राष्ट्रीय जाति जनगणना से पहले नाम को आधिकारिक तौर पर बदला जाए।
सदन में मांग टलने पर नाराज NDA विधायक विशाल प्रशांत ने तो यहां तक कह दिया कि अगर नाम नहीं बदला गया तो भूमिहार-ब्राह्मण समाज को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए।
समुदाय का तर्क साफ है - पहचान ऐतिहासिक दस्तावेजों से जुड़ी है और उसमें बदलाव नहीं होना चाहिए। अब देखना है कि नीतीश सरकार इस मांग पर क्या फैसला लेती है।
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