Bankipur उपचुनाव के बाद बिहार में नई सियासी हवा? क्या टूटेगा जातीय समीकरण का पुराना फॉर्मूला...
बांकीपुर उपचुनाव में दिखा यादव-कुर्मी का एक साथ आना क्या बिहार की सियासत में बदलाव का संकेत है? विश्लेषण में समझें कि ये तात्कालिक नाराजगी है या नए सोशल इंजीनियरिंग की शुरुआत। नीतीश के बाद कुर्मी वोटर किस तरफ जाएंगे?
पटना: बिहार की सियासत में एक बार फिर 'जाति' के गणित पर बहस छिड़ गई है। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने एक ऐसा समीकरण दिखाया जिसकी चर्चा हर राजनीतिक गलियारे में है। सवाल ये है कि ये बदलाव अस्थायी है या बिहार एक नए 'आदर्श' समीकरण की तरफ बढ़ रहा है।
M-Y से Luv-Kush तक का सफर
मंडल युग के बाद बिहार में यादव और कुर्मी की राजनीति सबसे मजबूत रही। एक तरफ लालू यादव तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार। दोनों ने मिलकर सत्ता चलाई, फिर अलग हो गए।
1994 में नीतीश ने लालू का साथ छोड़ समता पार्टी बनाई। वजह बताई गई ब्लॉक स्तर पर यादव-कुर्मी नेताओं की रंजिश और अफसरों का झुकाव। इसके बाद लालू के M-Y यानी मुस्लिम-यादव के जवाब में Luv-Kush यानी कुर्मी-कोइरी समीकरण बना। बीजेपी ने सवर्ण-वैश्य जोड़कर NDA की नींव रखी।
बांकीपुर में क्या अलग दिखा?
बांकीपुर में पहली बार यादव और कुर्मी वोट एक तरफ आते दिखे। इसके पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं:
1. कुर्मी नाराजगी: नीतीश के CM पद से हटने और JDU की कमान संजय झा-ललन सिंह जैसे सवर्ण नेताओं के हाथ में जाने से।
2. अतिपिछड़ा वोट: प्रशांत किशोर की जन सुराज के साथ जाना।
3. सवर्ण गुस्सा: भरत तिवारी एनकाउंटर, पेपर लीक जैसे मुद्दे।
क्षण भर का गुब्बार या दूरगामी असर?
वरिष्ठ पत्रकार का मानना है कि ये समीकरण "क्षण भर का गुब्बार" है। उनका कहना है- नीतीश के साइडलाइन होने से कुर्मी राजनीति खतरे में है। इसलिए बीजेपी से नाराज कुर्मी फिलहाल एकजुट दिखे। प्रशांत किशोर ने भी इसे भुनाया। लेकिन ये भी कहते हैं कि राजद कुर्मियों का विकल्प नहीं बनेगा। अगर नीतीश और निशांत कुमार कुर्मियों का भरोसा नहीं जीत पाए तो उनका झुकाव जन सुराज की तरफ हो सकता है।
आगे क्या?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कुर्मी समाज अभी विकल्प तलाश रहा है। बांकीपुर का नतीजा भले तात्कालिक गुस्सा हो, लेकिन इसने बिहार की सोशल इंजीनियरिंग पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
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