बिहार के स्वास्थ्य विभाग में नई हवा, निशांत कुमार की सख्ती से बड़े डॉक्टर भी लाइन में...
स्वास्थ्य मंत्री बनने के बाद निशांत कुमार ने सधी हुई लेकिन सख्त कार्यशैली अपनाई है। PMCH के प्रिंसिपल को हटाने से लेकर डॉक्टरों के तबादले और शो-कॉज नोटिस तक, बड़े अस्पतालों में पहली बार ऐसी कार्रवाई हुई है। पहले ही सत्र में दो विधेयक पास कराए। निरीक्षण, त्वरित कार्रवाई और संवाद को अपना मंत्र बनाकर निशांत क्राइसिस मैनेजमेंट और स्वास्थ्य सेवाओं के विकेन्द्रीकरण पर जोर दे रहे हैं।
स्वास्थ्य मंत्री का पद संभालते ही निशांत कुमार ने अपनी अलग पहचान बनाई है। तेज नहीं, लेकिन सधी हुई चाल। बाहर से शांत दिखने वाले निशांत अंदर से सिस्टम को बदलने में जुटे हैं।
पहले ही सत्र में 2 विधेयक पास
20 जुलाई को बिहार विधान परिषद के मानसून सत्र में निशांत का पहला दिन था और वो भी उनके जन्मदिन पर। 55 मिनट की कार्यवाही में 35 मिनट बधाइयों में निकल गए, इसके बावजूद मंत्री ने बिहार चिकित्सा संशोधन विधेयक 2026 और बिहार नर्सेज पंजीकरण संशोधन विधेयक 2026 - दोनों को पारित करा दिया।
"बड़ी मछली" पर पहली कार्रवाई
बिहार में सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के गायब रहने की शिकायत दशकों पुरानी है। निशांत ने इसे तोड़ने की शुरुआत PMCH से की।
पिछले महीने औचक निरीक्षण में तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. एनपी सिंह ड्यूटी पर नहीं मिले। नतीजा - उन्हें तुरंत पद से हटाकर बेतिया मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया।
इतने बड़े संस्थान के प्रिंसिपल पर कार्रवाई का साहस आज तक किसी स्वास्थ्य मंत्री ने नहीं दिखाया था।
इसके बाद सिलसिला नहीं रुका।
सर्जरी विभाग के डॉ. सरफराज आलम को शिकायत मिलने पर जांच कर मुजफ्फरपुर ट्रांसफर किया गया।
एलएनजेपी अस्पताल के निरीक्षण में 3 डॉक्टर फंसे। मरीजों ने बताया कि डॉ. श्याम किशोर उन्हें निजी क्लीनिक में बुलाते हैं। डॉ. राजकिशोर रौशन गैरहाजिर मिले और डॉ. अमरनाथ प्रसाद पर राउंड न लगाने का आरोप लगा। तीनों को 7 दिन में जवाब देने के लिए शो-कॉज नोटिस जारी हुआ है।
निशांत की कार्यशैली 3 बातों पर टिकी है।
1. औचक निरीक्षण - अस्पतालों में अचानक पहुंचकर हकीकत देखना
2. त्वरित कार्रवाई - गलती पर तुरंत तबादला या नोटिस
3. खुला संवाद - PMCH में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को 4 घंटे में बातचीत से खत्म करवाया
आगे की योजना: इलाज गांव तक
मंत्री का फोकस सिर्फ पटना के बड़े अस्पतालों पर नहीं है। वे स्वास्थ्य सेवाओं का विकेन्द्रीकरण करना चाहते हैं। जिला और प्रखंड स्तर के अस्पतालों को संसाधन देकर मजबूत किया जाएगा ताकि गांव के लोगों को इलाज के लिए PMCH का चक्कर न लगाना पड़े।
काम बोलता है
नेता की परख दो चीजों से होती है - संकट संभालना और नीति बनाना। अब तक निशांत दोनों पर खरे उतरे हैं। विनम्रता के साथ अनुशासन। इसी "चाणक्य नीति" पर चलकर वे बिहार के स्वास्थ्य सिस्टम को पटरी पर लाने की कोशिश में हैं।
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