कुर्मी को ताज-भूमिहार का राज से पेशोपेश तक - अनंत, नीरज, ललन विवाद में फंसे नीतीश, क्यों नहीं बन रहे पंच परमेश्वर, 15 दिन पहले वीटो लगाते तो नहीं बिगड़ती बात
एक समय बिहार में कहावत थी कुर्मी को ताज और भूमिहार का राज, जब 2005 में नीतीश CM बने और ललन सिंह JDU अध्यक्ष थे, लालू को हटाने और नीतीश को लाने में भूमिहार ब्राह्मणों की भूमिका मानी जाती थी, अब राज-ताज बदल गया और JDU अध्यक्ष नीतीश अपनी ही पार्टी के तीन भूमिहार नेताओं अनंत सिंह, नीरज कुमार, ललन सिंह के कारण पेशोपेश में हैं। MLA अनंत और MLC नीरज की लड़ाई निजी दुश्मनी बन गई, 15 दिन पहले नीतीश वीटो लगाते तो बात नहीं बिगड़ती, दोनों नीतीश का सम्मान करते हैं। 7 सितंबर को सुलह बैठक में भी नीतीश नहीं थे, सवाल है राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए दो माननीय टोपी उछाल रहे हैं और वे चुप क्यों, MLC चुनाव में JDU की प्रतिष्ठा दांव पर है। दिक्कत है पंच बनेंगे तो पक्ष किसका लेंगे, अनंत ने ललन का नाम जोड़ दिया, दोनों ओरिएंटेशन प्रोग्राम में नहीं आए, अब विवाद तीन भूमिहार नेताओं से जुड़ा है, किसी को गलत कहा तो नाराजगी, निशांत के भविष्य के लिए भूमिहार नेता को नाराज करने का जोखिम नीतीश नहीं लेंगे। अनंत का सवाल भी अनुत्तरित है - जब विधानसभा में नीरज ने JDU अधिकृत उम्मीदवार अनंत का विरोध किया तो क्या कार्रवाई हुई, तो
पटना - बिहार की राजनीति में कभी कहा जाता था - कुर्मी को ताज और भूमिहार का राज। यह 2005 का दौर था जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और ललन सिंह JDU अध्यक्ष थे, तब माना जाता था कि लालू को सत्ता से हटाने और नीतीश को लाने में भूमिहार-ब्राह्मण वोट की बड़ी भूमिका थी।
समय बदला, कहावत भी बदली और अब ताज-राज दोनों के बीच समीकरण उलझ गया है। JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार अपनी ही पार्टी के तीन बड़े भूमिहार नेताओं की वजह से पेशोपेश में हैं।
15 दिन पहले एक्शन लेते तो नहीं बिगड़ती बात
JDU विधायक अनंत सिंह और MLC नीरज कुमार की लड़ाई अब निजी दुश्मनी में बदल गई है। अगर नीतीश ने 15 दिन पहले ही वीटो लगा दिया होता तो मामला इतना नहीं बिगड़ता। दोनों नेता नीतीश के प्रति बेहद सम्मान रखते हैं, एक बार समझाते तो कड़वी बयानबाजी रुक जाती।
7 सितंबर को सुलह के लिए जो बैठक हुई, उसमें भी नीतीश नहीं थे। JDU में किसी की हिम्मत नहीं कि नीतीश की बात टाल दे, फिर भी वे चुप हैं। जबकि पटना स्नातक MLC चुनाव में JDU की प्रतिष्ठा दांव पर है।
पंच परमेश्वर बनने में क्या दिक्कत?
जानकार कहते हैं नीतीश पंच बन सकते हैं, लेकिन दिक्कत है - पक्ष किसका लेंगे? अनंत ने इस विवाद में केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का नाम भी जोड़ दिया है। अनंत की तरह ललन भी JDU के ओरिएंटेशन प्रोग्राम में नहीं आए। अब विवाद तीन भूमिहार नेताओं से जुड़ गया है। किसी को गलत ठहराया तो नाराजगी तय है, और इस समय नीतीश किसी भूमिहार नेता को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहते, निशांत कुमार के राजनीतिक भविष्य के लिए यह ठीक नहीं होगा।
अनंत के सवाल का जवाब किसके पास?
अनंत दलीय अनुशासन से बाहर जाकर निर्दलीय अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन उनका अपना तर्क है - "जब विधानसभा चुनाव में नीरज कुमार ने JDU के अधिकृत उम्मीदवार यानी मेरा विरोध किया, तब उन पर क्या कार्रवाई हुई?" JDU के पास इस सवाल का जवाब नहीं है, तो अब MLC चुनाव में अनंत को किस आधार पर गलत ठहराया जाए। नीतीश इसी पेंच में नहीं फंसना चाहते।
क्या चुप्पी निशांत की परीक्षा है?
सियासी जानकारों का मानना है नीतीश ज्यादा दिन चुप नहीं रहेंगे, अंत में व्यक्तिगत प्रभाव से मामला शांत करा देंगे। फिलहाल वे इस बहाने बेटे निशांत की राजनीतिक सूझबूझ परख रहे हैं - गहरे दबाव में वे कैसे परफॉर्म करते हैं, कल उन्हें ही पार्टी संभालनी है।
फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती तीखी बयानबाजी रोकना है, मीडिया में बयानों से ही मामला सुर्खियों में है। नहीं तो फाइनल जजमेंट नीतीश को ही करना होगा।
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