मायावती ने फिर चला ब्राह्मण कार्ड, क्या 2007 वाली सोशल इंजीनियरिंग 2027 में काम करेगी?
12 साल से चुनाव हार रही BSP अब शून्य पर। मायावती ने 2027 के लिए फिर 2007 वाला ब्राह्मण कार्ड खेला। सतीश मिश्रा को बड़ी जिम्मेदारी। लेकिन विश्लेषण कहता है- मोदी के बाद ब्राह्मण बीजेपी के साथ, BSP का कोर वोट भी छिटका। बिना ताकत दिखाए ब्राह्मण साथ नहीं आएगा।
लखनऊ: पिछले 12 साल से लगातार हार के बाद बहुजन समाज पार्टी आज 'करो या मरो' की स्थिति में है। 2022 में जीता एकमात्र विधायक भी नहीं रहा, लिहाजा आज BSP का विधानसभा और संसद दोनों में खाता नहीं खुला है। ऐसे में मायावती ने 2027 के लिए एक बार फिर 2007 वाला फॉर्मूला आजमाने का फैसला किया है।
सतीश मिश्रा को मिली बड़ी जिम्मेदारी
मायावती ने पार्टी के पुराने ब्राह्मण नेता सतीश चंद्र मिश्रा को कानूनी, मीडिया और चुनाव आयोग से जुड़े मामलों की कमान सौंपी है। ये साफ संकेत है कि BSP फिर से ब्राह्मण + दलित वाली सोशल इंजीनियरिंग पर दांव लगाएगी।
लेकिन क्या 2007 वाला माहौल बचा है?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2007 से गंगा में बहुत पानी बह चुका है।
3 वजह क्यों मुश्किल है:
1. कोर वोटर छिटका: मायावती का अपना दलित वोट बैंक का बड़ा हिस्सा BJP और SP में चला गया है। पहले अपना "मूलधन" वापस लाना होगा।
2. ब्राह्मण अब BJP के साथ: 2014 में मोदी के उदय के बाद ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया का वोट पूरी तरह बीजेपी के साथ शिफ्ट हो गया। यूपी में बृजेश पाठक उपमुख्यमंत्री हैं, हरीश द्विवेदी महामंत्री हैं। ऐसे में ब्राह्मण BJP छोड़कर क्यों जाएगा?
3. BSP की साख गिरी: मोदी के आने के बाद मायावती के बीजेपी से "डरने" वाली छवि बनी। हारने वाली पार्टी को कोई वोट नहीं देना चाहता। 2022 में सतीश मिश्रा ने खूब प्रचार किया, लेकिन ब्राह्मण वोट नहीं मिला।
2007 में क्या अलग था?
तब माहौल मायावती के पक्ष में था और BJP कमजोर थी। अंटू मिश्रा, नकुल दुबे, बृजेश पाठक, गणेश पांडे जैसे ब्राह्मण नेता BSP में थे। आज उनमें से ज्यादातर पार्टी छोड़ चुके हैं। अब सिर्फ सतीश मिश्रा बचे हैं।
रास्ता क्या है?
अगर मायावती को ब्राह्मण वोट चाहिए तो ज्यादा से ज्यादा ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने होंगे। जैसे अखिलेश ने अयोध्या से पवन पांडेय को टिकट दिया। लेकिन सच्चाई ये है कि राज्य स्तर पर ब्राह्मण अभी बीजेपी को पहली पसंद मानता है।
मायावती के लिए 2027 की लड़ाई सिर्फ चुनाव की नहीं, अस्तित्व की है। सतीश मिश्रा को आगे बढ़ाना मजबूरी है, लेकिन बिना ताकत दिखाए ब्राह्मण समाज का भरोसा जीतना आसान नहीं होगा।
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