आरक्षण समीक्षा पर सियासी घमासान, लालू की बेटी रोहिणी आचार्य बोलीं- जब तक गैर बराबरी है, तब तक समीक्षा उचित नहीं, संतोष सुमन-चिराग विवाद पर निशाना

संतोष सुमन की आरक्षण समीक्षा मांग पर चिराग पासवान के इस्तीफा बयान के बाद बिहार में सियासी विवाद तेज, लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने एक्स पर लिखा- जब तक सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी कायम है, आरक्षण की समीक्षा उचित नहीं। आरक्षण कल्याणकारी नहीं, सदियों के भेदभाव को दूर करने का संवैधानिक माध्यम, अनुच्छेद 15-16 और अंबेडकर के विजन का परिणाम, उप-वर्गीकरण के बिना यथावत रखना जरूरी, बिहार के नेताओं को नसीहत।

Aug 30, 2026 - 20:12
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आरक्षण समीक्षा पर सियासी घमासान, लालू की बेटी रोहिणी आचार्य बोलीं- जब तक गैर बराबरी है, तब तक समीक्षा उचित नहीं, संतोष सुमन-चिराग विवाद पर निशाना
आरक्षण समीक्षा पर सियासी घमासान, लालू की बेटी रोहिणी आचार्य बोलीं- जब तक गैर बराबरी है, तब तक समीक्षा उचित नहीं, संतोष सुमन-चिराग विवाद पर निशाना

पटना: बिहार में आरक्षण की समीक्षा को लेकर छिड़ी बहस अब और तेज हो गई है। जीतन राम मांझी के बेटे मंत्री संतोष सुमन ने समीक्षा की मांग की, तो केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने पलटवार कर इस्तीफे की मांग कर दी। इसी विवाद में अब लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य की एंट्री हो गई है।

रोहिणी आचार्य ने एक्स पर पोस्ट कर बड़ा दावा किया – जब तक सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी कायम है, तब तक आरक्षण व्यवस्था की किसी प्रकार की समीक्षा उचित नहीं है।

रोहिणी का तर्क क्या?

रोहिणी ने लिखा – आरक्षण सिर्फ कल्याणकारी योजना नहीं है, यह सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और असमानता को खत्म करने का संवैधानिक और संरचनात्मक माध्यम है। आरक्षण का मकसद सिर्फ गरीबी हटाना नहीं, बल्कि उन समुदायों को शासन, प्रशासन, शिक्षा और लोकतंत्र की मुख्यधारा में प्रतिनिधित्व देना है, जिन्हें लंबे समय तक दूर रखा गया।

उन्होंने बिहार के नेताओं को नसीहत देते हुए कहा – जब तक सभी वर्गों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं होता, समरसता नहीं आती, गैर बराबरी की खाई नहीं पटती, तब तक इसके स्वरूप को बदलना अनुचित होगा। कागज पर प्रगति दिखती है, पर जमीनी स्तर पर आज भी जातिगत भेदभाव मौजूद है।

संविधान और अंबेडकर का हवाला

रोहिणी बोलीं – अनुच्छेद 15 और 16 अवसरों की समता और सामाजिक न्याय की गारंटी देते हैं। मौजूदा आरक्षण बाबा साहेब अंबेडकर और संविधान सभा के विजन का परिणाम है, जो वंचितों के सशक्तिकरण को राष्ट्र निर्माण की पहली शर्त मानता है।

समीक्षा या उप-वर्गीकरण से वंचितों की सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों में कटौती का खतरा है। इसलिए आरक्षण को बिना उप-वर्गीकरण और बिना समीक्षा के यथावत रखना ही सामाजिक संतुलन और समावेशी लोकतंत्र के लिए जरूरी है।

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Kajal Tiwari

लेखक के बारे में, काजल तिवारी एक समर्पित पत्रकार और मीडिया प्रोफेशनल है, जिन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में वर्ष 2019 से अपने करियर की शुरुआत की। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में स्नातक एवं स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है। पिछले लगभग 6–7 वर्षों के अपने पत्रकारिता अनुभव में मुझे पटना के कई प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला है। इस दौरान पत्रकारिता के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से काम किया, जिसमें न्यूज़ रिपोर्टिंग, ग्राउंड रिपोर्टिंग, राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों की कवरेज, इंटरव्यू, कंटेंट राइटिंग और वॉयसओवर शामिल हैं। पत्रकारिता मेरे लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को लोगों तक जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ पहुँचाने का माध्यम है। मेरा प्रयास हमेशा तथ्यों पर आधारित, स्पष्ट और प्रभावी पत्रकारिता के माध्यम से पाठकों और दर्शकों तक सही जानकारी पहुँचाना रहा है।

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